Thursday, July 28, 2011
Monday, July 27, 2009
Zafar Iqbal
Yah jurm hai to is jurm ki sazaa rakhna: Zafar Iqbal
नहीं कि मिलने मिलाने का सिलसिला रखना
किसी भी सतह पे कोई तो
राब्ता रखना
मरेंगे
लोग
हमारे
सिवा
भी
तुम
पे
बोहत
यह
जुर्म
है
तो
फिर
इस
जुर्म
की
सज़ा
रखना
मदद की तुम से तवक्को
तो खैर क्या होगी
गरीब-ए-शहर-ए-सितम हूँ मेरा पता रखना
बस एक शाम हमें चाहिए न पूछना क्यूँ
यह बात और किसी शाम पे उठा
रखना
नए सफ़र पे रवाना हुआ हूँ अज़-सर-ए-नौ
जब आऊंगा तो मेरा नाम भी नया
रखना
फसील-ए-शौक़ उठाना ज़फर ज़रूर मगर
किसी तरफ से निकलने का रास्ता
रखना
ज़फर इकबाल
--
nahiiN ki milne milaane ka silsilaa rakhnaa
kisii bhii satah pe koii to raabtaa rakhnaa
mareNge log hamaare sivaa bhii tum pe bohat
yah jurm hai to phir is jurm kii sazaa rakhnaa
madad kii tum se tavaqqo to khair kyaa hogii
Gariib-e-shahar-e-sitam huuN meraa pataa rakhnaa
bas ek shaam hameN chaahiye na puuchhnaa kyuuN
yah baat aur kisii shaa pe uThaa rakhnaa
naye safar pe ravaanaa huaa huuN az-sar-e-nau
jab aauuNgaa to meraa naam bhii nayaa rakhnaa
fasiil-e-shauq uThaanaa Zafar zaruur magar
kissi taraf se nikalne kaa raastaa rakhnaa
Kisi ko ham na mile aur hamko tu na mila: Zafar Iqbal
यहां
किसी
को
भी
कुछ
हस्ब-ए-आरज़ू
न
मिला
किसी
को
हम
न
मिले
और
हम
को
तू
न
मिला
गिज़ाल-ए-अश्क सर-ए-सुबह
दूब-ए-मिज़्गाँ
पर
कब अपनी आंख खुली और लहू लहू न
मिला
चमकते चांद भी थे शहर-ए-शब के एवान
में
निगार-ए-गम सा मगर कोई शमा-रू न मिला
उन्ही की रम्ज़ चली
है गली गली में यहां
जिन्हें इधर से कभी इज़्न-ए-गुफ्तगू न
मिला
फिर आज मैकदा-ए-दिल से
लौट आये हैं
फिर आज हम को ठिकाने का सुबू न मिला
ज़फर
इकबाल
kisii ko ham na mile aur ham ko tuu na milaa
Ghizaal-e-ashk sar-e-subah duub-e-miZhgaaN par
kab apnii aaNkh khulii aur lahuu lahuu na milaa
--
yahaaN kisii ko bhii kuchh hasb-e-aarzuu na milaa
chamakte chaaNd bhii the shahar-e-shab ke aivaaN meN
nigaar-e-Gham saa magar koii shamaa-ruu na milaa
unhii kii ramz chalii hai galii galii meN yahaaN
jinheN idhar se kabhii izn-e-guftguu na milaa
phir aaj mai-kada-e-dil se lauT aaye haiN
phir aaj ham ko Thikaane ka subuu na milaa
Zafar Iqbal
Zafar Iqbal is considered one of the foremost Urdu poets of Pakistan. No contemporary Urdu poet has experimented more with the genre of gazals and also the language than him.
Sheikh Ibrahim Zauq's ghazal
अहद-ए-पीरी शबाब की बातें
ऎसी हैं जैसे ख्वाब की बातें
उस
के घर ले चला मुझे देखो!
दिल-ए-खाना-खराब की बातें
सुनते हैं उसको छेड़
छेड़ के हम
किस मज़े से अताब की बातें
ज़िक्र क्या जोश-ए-इश्क़ में ए
जौक़
हम से हों सब्र-ओ-ताब की बातें
शेख इब्राहिम
जौक
ahad-e-piirii shabaab kii baateN
aisii haiN jaise Khwaab kii baateN
us ke ghar le chalaa mujhe dekho!
dil-e-Khaana-Kharaab kii baateN
sunte haiN usko chheD chheD ke ham
kis maze se ataab kii baateN
zikr kyaa josh-e-ishq meN aye Zauq
ham se hoN sabr-o-taab kii baateN
Shekh Ibraahim Zauq
लाई हयात आए, क़ज़ा ले चली चले
अपनी ख़ुशी न आए, न अपनी ख़ुशी
चले
हम सा भी अब बिसात पे कम होगा बद-क़मार
जो चाल हम चले वह बोह्त ही
बुरी चले
बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे
पर क्या करें जो काम न
बे-दिल-लगी चले
हो उम्र-ए-ख़िज़्र भी तो म'अलूम वक़्त-ए-मर्ग
हम क्या रहे
यहां, अभी आए अभी चले
(शेख़ इब्राहीम ज़ौक़)
laayii hayaat aaye, qazaa le chalii chale
apnii khushii na aaye, na apnii khushii chale
*ham saa bhi ab bisaat pe kam hogaa bad-qamaar
jo chaal hum chale voh boh't hi burii chale
behtar to hai yahii ki na duniyaa se dil lage
par kyaa kareN jo kaam na be-dil-lagii chale
ho umr-e-Khizr bhii to ma'aluum vaqt-e-marg
hum kyaa rahe yahaaN, abhii aaye abhii chale
duniaa ne kis kaa raah-e-fanaa meN diyaa hai saath
tum bhii chale chalo yuuN hi jab tak chalii chale
Sheikh Ibrahim 'Zauq'
* kam honge is bisaat pe ham jaise bad-qamaar (first line of this couplet is often quoted as above)
(qaza=death, bad-qimaar=unlucky gambler)
1। उर्दू अत्लआइआत और ब्र्क़िआती तह्क़ीक़
______डाक्टर अत्श दुर्रानी 2
2। क़्ज़ाक़िस्तान मैं रूसी उर्दू ज़ख़ीरा कुत्ब
______डाक्ट्र रूफ़ आमीर 6
3। उर्दू रसएल के आशारिए का आशारीह
______डाक्ट्र सेय्द म्सूद ह्स्स्न 12
4। त्र्ज्मे का फ़्न
______डाक्ट्र ख़ालिद न्दीम 20
5। अफ़्सान्ह त्न्क़ीद
______जावेद र्ह्मानी 25
6। ग्ला उर्दू
______स्फ़्द्र क़ुरेशी 30
7। व्फ़ीअति अहलि क़्ल्म 2008
______डाक्ट्र मुह्म्म्द मुनीर अह्म्द स्लेच 31
नुक़्तहि न्ज़्र
11। ओर्त
______सेय्द ह्स्स्न स्ल्मान रिज़्वी 39
12। ह्रूफ़ि हजा का ल्सानी स्फ़्र ओर इम्ला
______न्ज्म्ह बानू 40
अख़्बारि उर्दू इस्लाम आबाद ज्नब्री 2009 श्माअरह 1 जिल्द 26
म्न्द्र्जात
1। ज्दीद उलूम से ह्मारी मुज्र्मान्ह बेनिआज़ी
___डाक्ट्र मुईन उल्द्दीन अक़ील 2
2। उर्दू का अर्बी से ल्सानी तल्क़ और तल्फ़्फ़्ज़ क्य त्क़ाज़े
____प्रोफ़ेस्र ग़ाज़ी इल्म उद्दीन 5
3। उर्दू म्साद्र ओ मुश्तिक़ात की त्श्कील ओ त्स्रीफ़
____स्फ़्द्र क़ुरेशी 12
4। उर्दू इत्लाइआत की निसाबि श्मूलिअत
____ड्र्। आत्श दुर्रानी 32
5। क़्ज़ाक़िस्तान मैं उर्दू
____प्रोफ़ेस्र ड्र्। रौफ़ अमीर 39
6। रिअस्त ज्म्मूं ओ क्श्मीर मैं उर्दू ज़ुबान की इब्त्दा
____सादीह ब्र्जीस म्लिक 45
7। उर्दू र्स्मु अल्ख़्त
____दाक्ट्र सेइद त्क़ी आबिदी 24
8। मुहम्म्द काज़िम की स्वानिह उम्री
____प्रोफ़ेस्र दाक्ट्र प्र्वेज़ प्र्वअज़ी 30
Patras Bukhari
ह्म
न्य
कल्ज
की
तअलीम
तू
ज़्रूर
पाइ
ऊर
बी-अय
भी
पास
क्र
लीअ
लेक्न
इस
निस्फ़
स्दी
के
दुरान
मै
गुज़ानी
हास्ट्ल
मैं
दाख़्ल
हून्य
की
इजाज़्त
ह्मैन
सिर्फ़
एक
द्फ़ह
मिली।ख़ुदा
का
यिह
फ़्ज़्ल
ह्म
प्र
किस
त्र्ह
होअ? यिह
स्वाल
इक
दास्तान
का
मुह्ताज
हे।
ज्ब
ह्म
ने
इन्ट्र्न्स
पास
किअ
तो
म्क़ामी
स्कूल
के
हेद्मास्ट्र
साहिब
ख़ास
तोर
प्र
मुबार्क्बाद
देने
केलिए
आए्।
क़्रीबी
रिशत्
दारत
Wednesday, July 22, 2009
Feb 2009
1। उर्दू अत्लआइआत और ब्र्क़िआती तह्क़ीक़
______डाक्टर अत्श दुर्रानी 2
2। क़्ज़ाक़िस्तान मैं रूसी उर्दू ज़ख़ीरा कुत्ब
______डाक्ट्र रूफ़ आमीर 6
3। उर्दू रसएल के आशारिए का आशारीह
______डाक्ट्र सेय्द म्सूद ह्स्स्न 12
4। त्र्ज्मे का फ़्न
______डाक्ट्र ख़ालिद न्दीम 20
5। अफ़्सान्ह त्न्क़ीद
______जावेद र्ह्मानी 25
6। ग्ला उर्दू
______स्फ़्द्र क़ुरेशी 30
7। व्फ़ीअति अहलि क़्ल्म 2008
______डाक्ट्र मुह्म्म्द मुनीर अह्म्द स्लेच 31
नुक़्तहि न्ज़्र
11। ओर्त
______सेय्द ह्स्स्न स्ल्मान रिज़्वी 39
12। ह्रूफ़ि हजा का ल्सानी स्फ़्र ओर इम्ला
______न्ज्म्ह बानू 40